Tuesday, 7 May 2019

बड़ी इलायची

बड़ी इलायची को लार्ज कार्डेमम के नाम से भी जाना जाता है | इसका वनस्पतिक नाम एमोमम सूबुलेटम है | यह जिन्जीबरेसी प्रजाति का पौधा है | इसका तना 0. ९ मीटर से २. 0 मीटर तक लम्बा होता है | इसके पौधे की पत्तियां 30 से 60 सेंटीमीटर लम्बी और 6 से 9 सेंटीमीटर चौड़ी होती है | इन पत्तियों का रंग हरा होता है और दोनों तरफ से रोम रहित होता है | इसके फूल के वृंत छोटे और गोल आकार में होते है | इसका फल 2 . 5 सेंटीमीटर लम्बा और गोलाकार होता है | इसका रंग लाल भूरा और घना कंटीला होता है |
बड़ी इलायची के उपयोग
इलायची को मसाले की रानी कहा जाता है | इसका उपयोग भोजन का स्वाद बढाने के लिए किया जाता है | लेकिन इसमें औषधिय गुण भी होते है जिससे मनुष्य अपनी बीमारी को दूर करते है | बड़ी इलायची से बनने वाली दवाईयों का उपयोग पेट दर्द को ठीक करने के लिए , वात , कफ , पित्त , अपच , अजीर्ण , रक्त और मूत्र आदि रोगों को ठीक करने के लिए  किया जाता है |  बड़ी इलायची के उपर एक छिलके जैसा आवरण होता है जिसके अंदर बीज होते है | इस बीज का काढ़ा बनाकर पीने से मसूड़ों और दांतों का दर्द ठीक हो जाता है | बड़ी इलायची की खेती करने से हमे अधिक फायदा मिलता  है | इसका निर्यात विदेशो में किया जाता है | जिससे हमे विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है |  यह एक महंगा मसाला है | इससे हम अधिक से अधिक आमदनी कमा सकते है |

बड़ी इलायची के पौध कैसे तैयार करें
बड़ी इलायची की खेती का भौगोलिक वितरण
भारत में बड़ी इलायची की खेती एक नकदी फसल के रूप में की जाती है | इसकी खेती सिक्किम , पश्चिमी बंगाल , दार्जलिंग , और भारत के उत्तर – पूर्वी भाग में अधिक की जाती है | बड़ी इलायची  भारत के उत्तर – पूर्वी भाग में प्रकृतिक रूप में पाई जाती है | इसके आलावा नेपाल , भूटान और चीन जैसे देश में भी इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है |

बड़ी इलायची से बने तेल के भौतिक और रासायनिक गुण
बड़ी इलायची से बना तेल रंगहीन होता है | लेकिन जब यह गाढ़ा हो जाता है तो इसका रंग पीला हो  जाता है | इसका विशसिष्ट घनत्व 270 डिग्री सेल्सियस का होता है | यह एल्कोहल में घुलनशील रासायनिक अवयव टरपीनस टरपीनीओल और सिनिओल आदि |

बड़ी इलायची की खेती के लिए उपयुक्त तापमान
बड़ी इलायची की खेती करने के लिए 10 डिग्री से 30 डिग्री का तापमान सबसे उत्तम माना जाता है | तापमान के साथ – साथ इलायची की अधिक उपज लेने के लिए नमी युक्त स्थान और छायादार स्थान का होना बहुत जरूरी है |

बड़ी इलायची की खेती करने के लिए उपयुक्त भूमि का चुनाव
जिस खेत में बड़ी इलायची की खेती की जा रही है उस खेत की मिटटी में प्रचुर मात्रा में नाइट्रोजन , फास्फोरस और पोटाश का होना बहुत जरूरी है | इसकी खेती अम्लीय दोमट मिटटी में सफलतापूर्वक की जाती है | लेकिन मिटटी में नमी की उचित मात्रा होनी चाहिए | यदि खेत की भूमि का पी. एच. मान 5 से 6 के बीच का हो तो बेहतर होता है | इस तरह की भूमि बड़ी इलायची की वृद्धि के लिए उत्तम होती है |

 बीजों को कैसे उपचारित करें
फसल बोने से पहले खेत की तैयारी

नर्सरी तैयार करना
बड़ी इलायची की खेती करने के लिए सबसे पहले हम एक पौधशाला बनाते है | पौधशाला में बीजों को कतारों में बोयें | बीजों को कम से कम 9 से 10 सेंटीमीटर की दुरी पर बोयें | मिटटी की नमी को बनाएं रखने के लिए इसके ऊपर सुखी घास , पुआल या पत्तियों की एक परत बिछा दें | इसके बीजों में अंकुरण मार्च के महीने में होने लगता है जो अप्रैल से मई के महीने तक चलता है | बीजों में अंकुरण होने के बाद भूमि पर से पुआल , और सुखी घास की परत को हटा देना चाहिए | इसके बाद पौधे की वृद्धि करने के लिए उचित छाया की व्यवस्था करनी चाहिए | इसकी तैयार नर्सरी में हर रोज कम से कम २ बार हल्की सिंचाई करनी चाहिए | जिससे मिटटी में नमी बनी रहे | जब पौध पर 5 या 6 पत्तियां निकल जाये तो इसे खेत में रोपण करने के लिए उपयोग करें | इसकी दूसरी नर्सरी तैयार करें जिसमें रोपाई जुलाई के महीने में करें | दूसरी नर्सरी का निर्माण करने के लिए 80 से 90 सेंटीमीटर लम्बी , 15 सेंटीमीटर चौड़ी और आवशयकता अनुसार ऊंचाई की कतार बनाये | क्यारी बनाते समय इसमें सड़ी हुई गोबर की खाद मिला दें | इसके बाद पहली नर्सरी से पौध को निकालकर दूसरी तैयार नर्सरी में रोपित करें | पौधे को 15 सेंटीमीटर की दुरी पर रोपें | जब इसके पौधे की लम्बाई 45 से 60 सेंटीमीटर की हो जाये और पौधे में से कम से कम 3 या 4 शाखाएं निकल जाये तो इन्हें अगले साल खेत में रोपित करें | इसे रोपने के लिए जुलाई का महिना अति उत्तम होता है |

प्रकन्द नर्सरी
प्रकन्द पौध नर्सरी बनाने के लिए 30 सेंटीमीटर चौड़ी और 30 सेंटीमीटर गहराई में गड्ढा खोदें | एक गड्डे से दुसरे गड्डे के बीच की दुरी लगभग 15 सेंटीमीटर की रखे | इन गड्ढो में वर्धि कलिका युक्त प्रकन्द पौध को 40 से 45 सेंटीमीटर की दुरी रोपित करें | इसके कंद को जुलाई महीने में  रोपित करें | इस तरह का पौधा बीमारी से रहित होता है | पौध को रोपित करने से पहले हर एक गड्डे में  सड़ी हुई गोबर की खाद को अच्छी तरह से मिला देना चाहिए | इसके बाद रोपाई की प्रिक्रिया शुरू करें | पौध लगाने के बाद गड्ढे के चारों और सुखी पत्तियों की एक मोटी सी परत बिछा दें | जब पौधे पर और भी अन्य शाखाएं निकल जाये तो नव कलिका युक्त दो शाखाओं को एक समहू में काटकर खेत में रोपित करें | इस तरह की विधि से आप प्रकन्द नर्सरी बना सकते है |

खेत में रोपाई करने के लिए
इलायची के पौधे की जुलाई या अगस्त के महीने में रोपाई करें | पौधे की रोपाई करने से पहले 30 सेंटीमीटर लम्बा , 30 सेंटीमीटर चौड़ा और 30 सेंटीमीटर गहरा गड्ढा खोद लें | इसकी 15 सेंटीमीटर नीचे की मिटटी को अलग निकालकर रख दें | इसके बाद अलग रखी हुई मिटटी में जंगल की खाद या गोबर की खाद मिलाकर गड्डे में भर दें | इसके बाद पौधे को रोपित करें | एक पौधे से दुसरे पौधे की बीच की दुरी १. 5 मीटर की होनी चाहिए | खेत के एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के भाग में कम से कम 400 पौधे लगाने चाहिए | खेत के चारों और बड़े पेड़ होने चाहिए जिससे इसके पौधे को छाया प्राप्त हो सके | छाया में इसकी अधिक वृद्धि होती है  और हमे अधिक से अधिक उपज की प्राप्ति होती है | हम इलायची की खेती अखरोट , संतरा , बांज लोध आदि वृक्ष के नीचे भी इसकी खेती कर सकते है |

बड़ी इलायची का प्रवर्धन
 प्रवर्धन
इलायची का प्रवर्धन प्रकन्द और उत्तक प्रजजन के द्वारा होता है | इसके बीजों की बुआई अक्तूबर या नवम्बर के महीने में की जाती है | बुआई करने से पहले बीजो को उपचारित किया जाता है | इसे उपचारित करने के लिए 25 % नाइट्रिक एसिड के घोल में बीजों को कम से कम 10 मिनट तक रख दें | इसके बाद बाद इसे बहते पानी में अच्छी तरह से धोकर बीजों को छाया में सुखा दें | ऐसा करने से बीजों में अधिक से अधिक अंकुरण होता है और समय पर एक साथ अंकुरण होता है |
उत्तक सम्वर्धन के द्वारा
इस विधि से उन्नत किस्म के पौधों को बहुगुणित किया जाता है | इस विधि के द्वारा तैयार पौधे में रोगों से लड़ने की क्षमता होती है | बड़ी इलायची के पौधे को वर्धि कलिका या कृत्रिम विधि से रोपित किया जाता है | इसके तीन महीने के बाद वर्धि कलिकाओं को जड़ और तने सहित पौधों का एक समहू उत्पादित किया जाता है | इन छोटे पौधे को दूसरी नर्सरी तैयार करके रोपित किया जाता है | दूसरी नर्सरी में रोपाई करने के 5 से 7 महीने के बाद इन्हें मुख्य खेत में रोपित कर दिया जाता है | इस विधि से प्राप्त बड़ी इलायची के पौध में रोग से लड़ने की क्षमता होती है | इसके साथ ही साथ हमे अधिक और अच्छी गुणवत्ता की उपज प्राप्त होती है |

 इलायची की फसल में प्रयोग होने वाली खाद और उर्वरक
इलायची के पौध तैयार करने के लिए बनाई गई पहली नर्सरी और दूसरी नर्सरी में उचित मात्रा में कम्पोस्ट खाद और उर्वरक खाद का उपयोग करना चाहिए | इससे हमे अच्छी उपज मिलती है | इसके आलावा जब हम पौध की रोपाई मुख्य क्षेत्र में करते है तो एक साल में दो बार सड़ी हुई खाद और कम्पोस्ट खाद को भूमि में डाल दें |

उर्वरक खाद का प्रयोग
किलोग्राम माइक्रो भू पावर , एक किलो माइक्रो फर्ट सिटी कम्पोस्ट , एक किलो सुपर गोल्ड मैग्नीशियम , एक किलो सुपर गोल्ड कैल्सी और एक किलो माइक्रो नीम आदि खाद को आपस में मिलाकर एक अच्छा सा मिश्रण बनाये | इस खाद के मिश्रण को जुलाई और नवम्बर के महीने में खेत में उगी हुई फसल में डाले |
 
सिंचाई
बड़ी इलायची की पहली नर्सरी में बीज बोने के बाद और अंकुरण से पहले एक दिन में कम से कम दो बार सिंचाई अवश्य करें | ताकि भूमि में नमी बनी रहे | जब बीजों का अंकुरण हो जाता है और जब हम इसके पौधे को दूसरी नर्सरी में रोपित करते है तो भी हमे भूमि की नमी को बनाये रखने के लिए दो से तीन बार हल्की – हल्की सिंचाई करनी चाहिए | इसके आलावा जब पौधे को मुख्य क्षेत्र में रोपित किया जाता है तो सिंचाई करना बहुत आवशयक है |

खरपतवार की रोकथाम
पहली नर्सरी में जब बीजो का अंकुरण होता है तो उसमे बड़ी ही सावधानी से खरपतवार को निकालना चाहिए | अन्यथा बीजो को हानि पंहुच सकती है | दूसरी नर्सरी में भी समय – समय पर हल्की निराई – गुड़ाई करके खरपतवार को निकाल दें | मुख्य भाग में जंहा पर इसकी निश्चित रोपाई की गई है उस भाग में साल में कम से कम तीन या चार बार निराई – गुड़ाई करनी चाहिए | हमे हमेशा खेत को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए |

इलायची की फसल में लगने बीमारी और उसकी रोकथाम के उपाय
इलायची की फसल में मुख्य रूप से दो प्रकार की बीमारी का प्रकोप होता है | ये बीमारी विषाणुओं के द्वारा फैलते है | इन बीमारी का नाम है :- फुरके और सिरके |
फुरके नामक बीमारी में पौधे में अधिक से अधिक टहनियां निकल जाती है | जिसे पोधा बोना रह जाता ही | जबकि सिरके नामक बीमारी में पौधे की पत्तियों पर पीले रंग के धब्बे पड़ जाते है | पत्तियों के इस भाग में हरित लवक नष्ट हो जाता है | जिसके कारण धीरे – धीरे पौधे की पत्तियां सुख जाती है | विषाणु जनित इन बिमारियों को पौधे से बचाने के लिए पुरे पौधे को उखाड़कर जला दें या भूमि के अंदर दबा दें | इलायची की फसल में यदि किसी और बीमारी का प्रकोप है तो उससे बचने के लिए रसायनों का छिडकाव करें | लेकिन इससे उपज की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ सकता है |
 पौधे को बीमारी से बचाने के लिए नीम की पत्तियों का काढ़ा तैयार करके माइक्रो झाझ्म मिलाकर फसलों पर छिडकाव करें | आप नीम के काढ़े के आलावा देसी गाय का मूत्र भी ले सकते है |

नीम का काढ़ा बनाने का तरीका
25 किलोग्राम नीम की पत्तियों को तोड्कर कुचल कर पीस लें | इसके बाद इन पत्तियों को 50 लीटर पानी में मिलाकर मंद अग्नि पर पकाएं | पकते हुए जब इस मिश्रण की मात्रा आधी शेष रह जाये तो इसे आंच से उतारकर ठंडा होने के लिए रख दें | तैयार काढ़े की आधे लीटर पम्प और माइक्रो झाझम की 25 मिलीलीटर की मात्रा को पानी में मिलाकर फसलों पर तर – बतर करके छिडकाव करें |
 10 से 15 लीटर गौमूत्र को लेकर किसी प्लास्टिक या कांच के बर्तन में 15 से २० दिन तक धुप में रख दें | जब यह मूत्र पुराना हो जाये तो इसकी आधी लीटर की मात्रा में 25 मिलीलीटर माइक्रो झाझम मिलाकर एक मिश्रण बनाएं | इस मिश्रण में पानी मिलाकर पम्प में भरकर फसलों पर छिडकाव करें | इस तरह के छिडकाव से फसल पूरी तरह से निरोग रहती है |

बड़ी इलायची में लगने वाले कीट
 1 कैटर पिलर :- ये पौधे की पत्तियों को खाने वाला कीट होता है |
 2 शूट बोरर :- यह कीट पौधे के तने में छेद करके उसे खोखला बना देता है |
 3 शूट फ्लाई :- यह पौधे के तने में घुसकर छोटे – छोटे छेद बना देते है जिससे तना पूरी तरह से खराब हो जाता है | इसके आलावा थेरिप्स और एफिड नामक कीट पौधे को नुकसान पंहुचाते है |
 कीटों की रोकथाम करने के लिए हमे कीटनाशक दवा का प्रयोग करना चाहिए | इससे उपज की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है |
 पौधे को बीमारी से बचाने के लिए नीम की पत्तियों का काढ़ा तैयार करके माइक्रो झाझ्म मिलाकर फसलों पर छिडकाव करें | आप नीम के काढ़े के आलावा देसी गाय का मूत्र भी ले सकते है |

 फसल की कटाई
फल आने पर और ऊपर से नीचे फल पकने के बाद फल युक्त शाखा को भूमि से 45 सेंटीमीटर ऊपर से काटना चाहिये | इसके बाद फलों को अलग निकालकर छाया में सुखाना चाहिए |

उपज की प्राप्ति
बड़ी इलायची का पौधा पहले और दुसरे साल में बढ़ता है और विकसित होता है | तीसरे और चौथे साल में एक हेक्टेयर भूमि से 500 से
700 किलोग्राम की उपज मिलती है | इससे हमे अधिक मुनाफा मिलता है | क्योंकि बड़ी इलायची की बाजार में कीमत बहुत ज्यादा है |

भण्डारण
पूरी तरह से सूखे हुए फलों को पोलीथिन से बने बस्तों में भर दें | इसे किसी लकड़ी से बने हुए बोक्स में इस तरह से रखे कि इसमें नमी ना जा सके | इसके आलावा हमे इसके फलों को फफूंदी लगने से भी बचाना चाहिए |

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नींबू की खेती
नींबू की खेती विश्व में सबसे ज्यादा भारत में होती है। यह एक अच्छा और फायदेमंद व्यापार है। इसका वानस्पतिक नाम है साइट्रस लैटिफ़ोलिया जो कि रुटेसी परिवार से संबंध रखती है। बीजरहित नींबू संकर मूल का होता है, जो कि खट्टा नींबू (साइट्रस औरंटीफोलिया) और बड़ा नींबू (साइट्रस लिमोन) या चकोतरा (साइट्रस मेडिका) के बीच एक सलीब से होने की संभावना है।
यह एक मध्यम आकृति का, लगभग कॉटे रहित वृक्ष है, जो कि विस्तृत फैल, झालरदार शाखाओं के साथ 4.5 से 6.0 मीटर (15 से 20 फीट) लंबा है। फूल हल्का बैंगनी के साथ सफेद रंग के होते है। फल अंडाकार या आयताकार है जो कि 4 से 6.25 सेंटीमीटर (1.5 से 2.5 इंच) चौड़े और 5 से 7.25 सेंटीमीटर (2 से 3 इंच) लंबे है, आम तौर पर कुछ बीजों वाले या बीजरहित होते है।

भूमि एवं जलवायु
हल्की एवं मध्यम उपज वाली बलुई दोमट मिट्टी नींबू वर्गीय फलों के लिए उपयुक्त होती है। नींबू का पेड़ लगाने के लिए वहां की मिट्टी का पीएच 5.5 से 6.5 के बीच होना चाहिए। यदि पीएच इससे कम है, तो आप इसे नियंत्रित करनें के लिए मिट्टी में बेकिंग सोडा या अन्य कोई छारिय दवाई डाल सकते हैं। झारखंड राज्य की लाल लेटराईट मिट्टी जिसमें जल निकास की अच्छी व्यवस्था होती है तथा पी.एच.मान भी अम्लीय है नींबू वर्गीय फलों के लिए उपयुक्त है। इसके लिए उपोष्ण कटिबन्धीय अर्धशुष्क जलवायु अत्यंत उपयुक्त है। जिन क्षेत्रों में सर्दी लम्बे समय तक होती है और पाला पड़ने की सम्भावना रहती है इसके लिए उपयुक्त नहीं है।

उन्नत किस्में
नींबू वर्गीय फलों में दो प्रकार के फल प्रमुख हैं। एक तो वे जो खट्टे फल देते हैं और दूसरे जो मीठे फलों के लिए उगाए जाते हैं। खट्टे फलों में मुख्य रूप से लाइम और लेमन है जबकि मीठे फलों में संतरा, मौसमी, मीठा नींबू, ग्रेपफ्रूट, डाब आदि प्रमुख हैं। झारखंड राज्य में विभिन्न फलों की निम्नलिखित किस्में उगाई जा सकती हैं।

1 खट्टा नींबू (लाइम) – कागजी कलान, सीडलेस, रंगपुर लाइन, विक्रम, प्रोमालिनी
2 नींबू (लेमन) – नेपाली ओवलांग, पंत लेमन-1, आसाम लेमन (गंधराज), सीडलेस, बारामासी
3 संतरा – किन्नो, नागपुर, संतरा, कुर्ग संतरा, खासी संतरा
4 मौसमी – माल्टा, मुसम्बी, सथगुड़ी, पाइनएप्पल, ब्लड रेड, जाफा
5 ग्रेपफ्रूट – मार्स सीडलेस,गंगानगर रेड, डंकन, रूबी रेड
5 डाब – चकोतरा, गागर, स्थानीय डाव
कागजी निम्बू  - इसकी Wide popularity के वजह से इसे खट्टा नीबू का समानार्थी माना जाता है।
प्रमालिनी निम्बू  -- इस किस्म के निम्बू साखा  में फलते है, और इसके एक गुच्छे में लगभग 3 से 7 तक फल लगते हैं । प्रमालिनी निम्बू कागजी नीबू के compare में 30% ज्यादा उपज देती है ।
विक्रम निम्बू  -- इसके फल भी गुच्छा  में हीं फलते है । एक गुच्छा (bunch)में लगभग 5 से 10 फल लगते है ।
चक्र धर निम्बू   -- इस निम्बू में बीज नहीं होते है और इसके फल से लगभग 65% रस निकलता है ।
पि.के. एम् -1  -- यह भी ज्यादा उत्पादन वाली किस्मो में से एक है । इसके फलो से लगभग 50% रस प्राप्त हो जाते है ।
उपरोक्त किस्मों में से मीठे वर्ग में किन्नों और नागपुर संतरा, माल्टा, ब्लड रेड, सथगुड़ी, मुसम्बी, चकोतरा और स्थानीय डाव तथा खट्टे वर्ग में कागजी कलान, सीडलेस, नेपाली ओवलंग, पंत लेमन -1 और गंधराज की व्यवसायिक खेती झारखंड में की जा सकती है।

बीजरहित नींबू की रोपण
बगीचा लगाने के लिए 5x 5 मी. की दूरी पर वर्गाकार विधि में रेखांकन करके 60 सें.मी.x  60 सें.मी.x 60 सें.मी. आकार के गड्ढे तैयार करने चाहिए।  पेड़ों को 16 इंच (40.5 सेंटीमीटर) गहरे कटे हुए खाइयों के चौराहे पर या पिसा चूना पत्थर और मिट्टी के ढेर पर लगाया जाता है। पेड़ लगाते समय नमी वाले क्षेत्रों से बचें या बाढ़ या पानी को बरकरार रखने वाले जगह से बचें, क्योंकि पेड़ जड़ सड़न से ग्रस्त हो जाते है।
पेड़ों के अंतरालन 20 फीट (6 मीटर) की अलग-अलग पंक्तियों में 10 या 15 फीट (3-4.5 मीटर) के करीब हो सकती है, जिससे प्रति एकड़ में लगभग 150 से 200 पेड़ समायोजित हो सके।
गड्ढों की खुदाई मई-जून में तथा भराई जून-जुलाई में करनी चाहिए। यदि मिट्टी अत्यंत खराब है तो तालाब की अच्छी मिट्टी में 20-25 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी खाद, 1 कि.ग्रा. करंज/नीम/महुआ की खली, 50-60 ग्राम दीमकनाशी रसायन, 100 ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट/डीएपी प्रति गड्ढे के दर से देने से बाग़ स्थापना अच्छी होती है एंड पौधों की बढ़वार भी उचित रहती है। पौधों को जुलाई-अगस्त में गड्ढों के बीचो-बीच उनके पिण्डी के आकार की जगह बनाकर लगाना चाहिए तथा उनके चारों तरफ थाला बनाकर पानी देना चाहिए। पौधा लगाते समय यह ध्यान रखें कि उनका ग्राफ्टिंग/बांडिग का जोड़ जमीन से 10-15 सें.मी. ऊपर रहे।

सिंचाई
निम्बू की खेती में सालो भर नमी की जरुरत होती है । रोपण के समय नये पेड़ों में पानी देना चाहिए और पहले सप्ताह में हर दूसरे दिन और फिर पहले कुछ महीनों में सप्ताह में एक या दो बार सिंचाई करना चाहिए। लंबे समय तक शुष्क अवधि (उदाहरण के लिए, पांच या अधिक दिन के अवधि की अनावृष्टि) के दौरान, नये लगाए गये और युवा वृक्षों में, पहले तीन वर्ष, हफ्ते में दो बार, अच्छी तरह से सिंचाई करना चाहिए। वर्षा के मौसम में सिंचाई की जरुरत नहीं होती है । ठंड के समय 1 month के interval पर सिंचाई और गर्मियों में 10 days के interval पर सिंचाई करना होता है ।
नींबू में उर्वरक  का प्रयोग
प्रथम वर्ष के दौरान हर दो से तीन महीनों में नये पेड़ों में उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए, 114 ग्राम उर्वरक के साथ शुरुआत करके वृक्ष प्रति 455 ग्राम तक बढ़ाना चाहिए। इसके बाद, वृक्ष के बढ़ते आकृति के अनुपात में प्रति वर्ष तीन या चार बार उर्वरक का प्रयोग में बृद्धि पर्याप्त होती है, लेकिन प्रत्येक वर्ष प्रति वृक्ष 5.4 किलोग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए। उर्वरक मिश्रण में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा 6-10 प्रतिशत और मैग्नीशियम 4-6 प्रतिशत रहने से युवा वृक्षों में संतोषजनक परिणाम मिलते है। फल-धारक पेड़ों के लिए, पोटाश को 9-15% तक बढ़ाया जाना चाहिए और फॉस्फोरस को 2-4% तक कम किया जाना चाहिए। घास-पात से ढकना: यह प्रक्रिया मिट्टी की नमी को बनाए रखने में मदद करता है, पेड़ के छत के नीचे जंगली घास की समस्याओं को कम कर देता है और सतह के पास मिट्टी में सुधार में मदद करता है। छाल या लकड़ी के टुकड़े की 2-6 इंच (5-15 सेंटीमीटर) परत के साथ पेड़ों के सतह को आवरण किया जा सकता है। इस आवरण को पेड़ का तना से 8-12 इंच (20-30 सेंटीमीटर) दूर प्रयोग करना चाहिए, अन्यथा पेड़ का तना सड़ सकता है।   

नींबू में परागण
वृक्ष में फल लगने के लिए परागण की आवश्यकता नहीं होती है, हालांकि मधु मक्खियों और अन्य कीड़े अक्सर खुली फूलों की पास घूमते रहते है।

फलों का उत्पादन
पेड़ फरवरी से अप्रैल तक (बहुत गर्म क्षेत्रों में, कभी-कभी वर्ष भर में) पांच से 10 फूलों के समूहों में खिलते है और अनुगामी फल उत्पादन 90-120 दिन की अवधि के भीतर होते है। फल लगने के समय गिबेलिलिक एसिड (10 पीपीएम) के छिड़काव परिपक्वता देरी करता है तथा फलों के आकृति में वृद्धि करता है। युवा, तेज़ी से बढ़ने वाला वृक्ष रोपण के बाद अपना पहला साल 3.6-4.5 किलोग्राम और दूसरे वर्ष 4.5-9.1 किलोग्राम का फल उत्पादन कर सकते है। अच्छी तरह से देखभाल किये गये पेड़ सालाना 9.1-13.6 किलोग्राम का फल तीन साल में दे सकता है, जो कि चार वर्ष में 27.2-40.8 किलोग्राम, पांच वर्ष में 49-81.6 किलो, और छह वर्ष में 90.6-113.4 किलोग्राम दे सकता है।

फसल तुड़ाई
फल परिपक्वता प्रारंभ होने पर एक-एक फल को हाथ से तोड़ा जाता है लेकिन एक टमटम भी इस्तेमाल किया जा सकता है। सालाना लगभग 8-12 बार फसल तुड़ाई होता है। इसका सटीक समय जुलाई से सितंबर तक है, 70% फसलें मई में परिपक्व होती है। लगभग 40% फसलों का उपयोग केवल रस के गाढ़ा बनाने के लिए किया जाता है। अपरिपक्व फल रस का उत्पादन नहीं करता है, इसलिए इसे उस समय नहीं तोड़ा जाना चाहिए। बीजरहित नींबू के फलों के लिए परिपक्वता संकेत रस सामग्री (वज़न के अनुसार 45 प्रतिशत रस) और फल का आकृति (50-63 मिलीमीटर) है। फलों के संवेष्टन प्रक्रिया के दौरान, उत्कृष्ट गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए, फल पूरी तरह से शुष्क होने पर ही तुड़ाई करना चाहिए।

नींबू के कीट और रोग
डायफोरिना साइट्री
यह पत्तियों और युवा तने पर हमला करता है, वृक्ष को गंभीर रूप से कमजोर कर देता है। यह ग्राम-नकारात्मक जीवाणु रोग को फैलाता है, जिसे पीला तना रोग के नाम से जाना जाता है, जो नींबू के पेड़ों के लिए घातक है। 

टोक्सोप्टेरा साइट्रिसिडा
इस कीड़े का बच्चा आमतौर पर पत्ती की ऊपरी सतह पर हमला करती है। इस बजह से संक्रमित पत्तियां विरूपण का कारण बनता है, जो पत्ते के कार्यात्मक सतह क्षेत्र को कम करता है।

घुन
साइट्रस लाल घुन (पोननीचुस साइट्री) आम तौर पर पत्ती की ऊपरी सतह पर हमला करता है, जिसके परिणामस्वरूप भूरा, परिगलित क्षेत्र बन जाते है। गंभीर आक्रमण से पत्ता गिरना शुरू हो सकता है।
जंग-घुन (फिलेकोप्रेटा ऑलिवोरो) और चौड़ा-घुन (पॉलीफागोटारसोनमस लैटस) पत्तियों, फल और तने पर हमला कर सकते है। इन कीड़े के भक्षण से फल का छिलका भूरा रंग का हो जाता है। अधिक प्रकोप की दशा में पत्ते पे सल्फर का छिड़काव द्वारा कीड़ों को नियंत्रण किया जा सकता है।

लाल शैवाल
यह छाल विभाजन और शाखाओं के मरने का कारण बनता है। यह सेफ़ालेउरॉस विरेसेंस के कारण होता है। मध्य गर्मी से बाद की गर्मियों तक 1-2 तांबा आधारित रासायनिक का छिड़काव द्वारा शैवाल का नियंत्रण किया जा सकता है।

कोलेटट्रिचम एकुटाटम
बरसात के मौसम में इस बीमारी की उपस्थिति सबसे अधिक प्रचलित है। इस रोग के शुरुआती लक्षणों में भूरे रंग से, फूलों की पंखुड़ी पर पानी के लथपथ घावों शामिल है। उसके बाद पंखुड़ियों नारंगी रंग में बदल जाते है और सूख जाते है।

नींबू के विषाणु संक्रामक रोग
पेड़ कई वायरस के लिए अतिसंवेदनशील है, जैसे कि  सोरोसिस, ट्रिस्टेजा, एक्सकोर्टिस और ज्यलोपोरोसीस। सोरोसिस वृक्षों के अंगों पर छाल परत का कारण बंता है। फल के छिलके पर अंगूठी जैसे निशान हो सकते है। यह संक्रमण संभवतः संक्रमित कलम बांधने के उपकरण के द्वारा कली लकड़ी में फैलता है।
कलम बांधने के उपकरण पर सोडियम हाइपोक्लोराइट के उपयोग से वायरस के यांत्रिक फैलाव को रोका जा सकता है। कलम बांधने के लिए उपयुक्त मूल-बृंतों का उपयोग करना चाहिए, जैसे पोनसिरस ट्राइफोलियटा (सोरोसिस, ट्रिस्टेजा, एक्सकोर्टिस और ज्यलोपोरोसीस के लिए प्रतिरोधी), ट्रोयर और कर्रिजों सिटरेंजस, जो कि पोनसिरस ट्राइफोलियटा और साइट्रस सीनेन्सिस के बीच संकर है (ट्रिस्टेजा और ज्यलोपोरोसीस के लिए सहनशील), साइट्रस ऐरांटियम (सोरोसिस, एक्सकोर्टिस और ज्यलोपोरोसीस के लिए प्रतिरोधी), साइट्रस रेशनी (सोरोसिस, ट्रिस्टेजा, एक्सकोर्टिस और ज्यलोपोरोसीस के लिए सहनशील) तथा स्विंगल सिट्रोमलो, जो कि साइट्रस परादीसी और पोनसिरस ट्राइफोलियटा के बीच संकर है (सोरोसिस, ट्रिस्टेजा, एक्सकोर्टिस और ज्यलोपोरोसीस के लिए सहनशील)।

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काजू की खेती

काजू(एनाकार्डियम ऑक्सी डेन्टेकल एल), एनाकार्डियेसिया कुटुंब का है। काजू का मूलस्थान ब्राजील है, जहाँ से 16वीं सदी के उत्तरार्ध में उसे वनीकरण और मृदा संरक्षण केप्रयोजन से भारत लाया गया,  हालांकि आजकल इसकी खेती दुनिया के अधिकाश देशों में की जाती है। सामान्य तौर पर काजू का पेड़ 13 से 14 मीटर तक बढ़ता है। हालांकि काजू की बौना कल्टीवर प्रजाति जो 6 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है, जल्दी तैयार होने और ज्यादा उपज देने की वजह से बहुत फायदेमंद व्यावसायिक उत्पादकों के लिए साबित हो सकती है ।
काजू कर्नल का प्रयोग मिष्टान्न तैयार करने में किया जाता है। काजू के कवच से बहुत ही उपयोगी तेल उपलब्धा होता है जिसका औद्योगिक कार्यों के लिए प्रयोग किया जाता है। इस तेल को काजू कवच द्रव(CSNL) कहा जाता है। काजू आपिल को यूँ ही फल की तरह खाया जाता है या फल-सलाद में मिलाया जाता है या फिर इसके रस से पेय तैयार किया जाता है। काजू आपिल से एक मादक पेय भी तैयार किया जाता है जो फनी नाम से प्रसिद्ध है।

जलवायु

काजू एक उष्ण कटिबंधी फसल है। यह उष्णह, गीले तथा प्ररूपतया उष्णहकटिबंधी जलवायु में पलता है। सामान्य‍त: काजू की खेती 700 मी. से कम ऊॅचाई वाली जगहों में ही होती है जहॉं पर तापमान 20° सें. से कम नहीं होता। फिर भी, कभी-कभी ये 1200 मी. तक की ऊँचाई पर भी पलते हैं। वैसे,
और सलाना वर्षा 1000 से 2000 मिमी तक होती है। फूल लगने और फल लगने के बीच 36 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा तापमान होने पर पौधे पर फल नहीं आते, और आएं भी तो टिक नहीं पाते। पूरे साल होने वाली वर्षा काजू के लिए अच्छी नहीं होती, हालाँकि पौधे बढ़ सकते हैं और कभी कभी फल भी आ सकते हैं। काजू की अच्छी उपज के लिए जरूरी है कि साल कम से कम 4 महीने की निश्चित अवधि में मौसम सूखा रहे। अगर फूल लगने की अवधि में भारी वर्षा जो और नमी ज्यादा रहे तो फूल और फल झड़ जाते हैं और फफूँदजन्य रोगों का खतरा बढ़ जाता है। तटीय प्रदेश ही काजू के लिए सबसे अनुकूल है। काजू एक ढीठ फसल है जो अनावृष्टि की अवस्थार का भी सहन कर लेती है। परंतु सर्दी इसके लिए एकदम प्रतिकूल है।

मृदा
काजू एक ढीठ फसल है जो सिवाय भारी चिकनी मिट्टी, दलदली मृदा व लवण मिट्टी के अन्या सभी प्रकार की मृदा में पलती है। फिर भी, जलोत्सा रित लाल, बलुई तथा लैटराइट मृदा ही इसके लिए सबसे अनुकूल है। काजू के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मिट्टी वह होगी जो गहरी हो जहाँ जलजमाव न हो, जो बलुआ दोमट किस्म की हो और मिट्टी के नीचे कठोर सतह न हो, शुद्ध बलुआ मिट्टी में भी काजू पैदा होगा लेकिन ऐसी मिट्टी में खनिजों की कमी आशंका होती है। काजू की खेती के लिए ऐसी मिट्टी उपयुक्त नहीं होती, जो भारी किस्म की हो और जिसमें जलनिकास की अच्छी व्यवस्था न हो, 8.0 से अधिक पीएच वाली मिट्टी भी काजू की खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती। काजू के फसल अत्यधिक क्षारीय या अत्यधिक लवणीय मिट्टी में नहीं बढ़ती, लाल बलुआ दुम्मट, लैटराइट तथा तटीय रेतीली मिट्टी भी, जिसका पीएच हल्का अम्लीय हो, काजू की खेती के लिए सर्वोत्तम होती है।

रोपण सामग्री
काजू संकर परागणवाली फसल है और बीज से पैदा हुए पौधों की काजू की गिरी, एप्पल और उत्पादकता में बहुत विविधता होती है | रोपण सामग्री चुनते वक्त अत्यंत सावधानी बरतनी है। काजू का, बहुत बड़ी मात्रा में पर-परागणन होता है। अत: खरी रोपण सामग्री उत्पन्न करने के लिए व्याावसायिक पैमाने पर कायिक प्रवर्धन संस्तु्त है।

अंतराल
काजू के लिए सामान्य्त: संस्तुईत अंतराल 7.5 X 7.5 मी. से 8 X 8 मी. तक है जिसे प्रबंधन-क्षमता तथा मृदा के अनुसार 4 X 4 मी. तक कम किया जा सकता है। रोपण के 7-9 साल तक जगह की बचत केलिए उच्च सघन रोपण पद्धति अपनाई जा सकती है जिसमें अंतराल 4 X 4 मी., 5 X 5 मी. या 4 X 6 मी. होता है। 8-9 साल बाद अधिशेष पौधों को निकालकर अंतराल को 6 X 8 मी., 8 X 9 मी. या 10 X 10 मी. तक बढाया जा सकता है।

रोपण प्रक्रिया तथा रोपण काल
काजू में वर्ग रोपण प्रक्रिया उत्त म है। सबसे अनुकूल रोपण काल मानसून ऋतु (जून - दिसंबर) ही है जब पूर्वी तट तथा पश्चिमी तट की वायु में आर्द्रता की मात्रा अधिक होती है। जहॉं पर सिंचाई की सुविधा उपलब्धप हो वहॉं शीत काल को छोड़कर अन्य किसी भी महीने में रोपण किया जा सकता है। सामान्यशत: काजू 60 X 60 X 60 मी. के गड्ढों में रोपा जाता है। गड्ढों को रोपण के 15-20 दिवस पहले ही खोदकर सूर्यप्रकाश में खुला छोड़ दिया जाता है ताकि कलमों की जड़ खराब करने वाले दीमक व चींटी दूर हो जाएं। गड्ढे का तीन-चौथाई भाग उपरिमृदा तथा जैव खाद के मिश्रण से भरा जाता है। कलमों को रोपने से पहले उसके बाहर के पॉलीथीन बैग निकाला जाता है। रोपते वक्तस खयाल रहना चाहिए कि कलम-जोड़ ज़मीन से कम से कम 5 सें.मी. ऊपर हो। कलम-जोड़ पर जो पॉलीथीन टेप लगाया होता है उसे भी अत्यं त सावधानी से निकालना चाहिए। कलमों को तीक्ष्ण हवा से बचाने के लिए रोपण के तुरंत बाद स्थूयणन अनिवार्य होता है। रोपण के पहले कुछ सालों में पौधों की द्रोणी जैवापशिष्ट् से पलवारा जाए।

उर्वरक व खाद का प्रयोग
ठीक मात्राओं में उर्वरक व खाद लगाना, पेड की वृद्धि तथा पुष्पदन में सहायक होता है। प्रति पेड़ 10-15 किलो गोबर या कंपोस्ट लगाना उपयोगी होता है। काजू के लिए संस्तुयत उवर्रक है, 500 ग्राम नाइट्रोजन (1.1 किलो यूरिया),125 ग्राम P2O5 (265 ग्राम रॉक फॉस्फेूट) तथा 125 ग्राम K2O (208 ग्राम पॉटैश म्यूिरियट) प्रति पेड़ प्रति वर्ष। उर्वरक डालने का अनुकूलतम समय भारी वृष्टि के तुरंत बाद की अवधि है जब मृदा में काफी नमी हो। रोपण के पहले तथा दूसरे सालों में उर्वरक की उपर्युक्तै मात्राओं की क्रमश: एक तिहाई तथा दो तिहाई उर्वरक डालना चाहिए। तीसरे साल से पूरी मात्रा में उर्वरक डालना चाहिए।

प्रौढ़ काजू वृक्ष के लिए जिन उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए वे है:

500 ग्राम नाइट्रोजन (1.1 किग्रा यूरिया), १२५ ग्राम पी2 ओ5 (7.50 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट) और १२५ ग्राम के2ओ (200 ग्राम पोटाश का म्यूरिएट)। एक पौधे के लिए पुष्टिकारक आवश्यकताओं को और उर्वरकों का विवरण तालिका 2 में दिया गया है:

पौधे की आयु यूरिया (ग्राम) सिंगल सुपर फॉस्फेट (ग्राम) पोटाश का म्यूरिएट
पहला साल 375 275 75
दूसरा साल 750 525 150
तीसरा साल 1100 750 200
Note
उर्वरकों का प्रयोग बारिश के रूक जाने के तुरंत बाद किया जाना चाहिए। उर्वरक ड्रिप लाइन के किनारे किनारे वृत्ताकार ट्रेंच में डाला जाना चाहिए। उर्वरकों के प्रयोग के पहले मृदा की नमी सुनिश्चित कर लेनी चाहिए। मानसून के पहले (मई-जून) और बाद (सिंतबर –अक्टूबर) – इस तरह दो बार डाला जाए, जब मिट्टी में पर्याप्त नमी रहती है। बलूवाही और लैटरा इट मृदा में ढलानवाली जमीन में और भारी वर्षा वाले इलाकों में उर्वरकों को पौधे से 1 ½मीटर की दूरी पर वृत्ताकार 25 सेंमी. चौड़े और 15सेंमी गहरे खड्डे में डाला जाना चाहिए। लाल दोमट मृदा और कम वर्षावाले क्षेत्रों में पहले साल पौधे से 5मी की दूरी पर, दूसरे साल 7 मीटर की दूरी पर, तीसरे साल 1 मीटर की दूरी पर और चौथे और आगे के सालों में 1.5 मीटर की दूरी पर बनी वृत्ताकार मेड़ों पर डाला जाना चाहिए।

निराई
तने के आसपास 2 मीटर के व्या6सार्घ तक की सफाई हाथ से की जाए। निराई रासायनिकों से भी संभव है। इसके लिए एक लीटर पानी में 6-7 मिल्ली लीटर ग्लाइफॉसेट मिलाकर जून-जुलाई महीने में लगाया जाता है।

पलवारन
मृदा की आद्रता बनाए रखने एवं मृदा-अपर्दन रोकने के लिए समय-समय पर पेड़ों की द्रोणी पलवारना अनिवार्य होता है। पलवारन यदि जैवमात्रा से हो तो और भी बहत्त र होगा क्योंणकि इससे अपतृण का नियंत्रण होता है साथ ही, गरमी के मौसम में उपरि-मृदा से जल-वाष्पोन होने की जो प्रवृत्ति है उसमें भी रोकथाम होगा और मृदा का तापमान भी ठीक रहेगा। ढालू जगहों में खाइयॉं खोदकर पलवारा जाता है। ऐसा करने से, मृदा संरक्षण एवं आर्द्रता संरक्षण होता है और उत्पा दन भी बढता है।

काटछॉंट
काजू-बागानों में काटछॉंट बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। रोपण के पहले साल में काजू-कलमों के प्रकंदों से फूटने वाले अंकुरों को बारंबार तोड़ना अनिवार्य है। इसीप्रकार आगे चलकर भी पेड़ के निचले प्ररोहों, आड़े-तिरछे प्ररोहों तथा सूखे प्ररोहों को समय-समय पर निकालने से पुष्पन व फलन में वृद्धि होती है।

सिंचाई
वैसे तो भारत में वृष्टिमय स्थितियों में ही काजू की खेती की जाती है। लेकिन गरमी के महीनों में प्रति पेड़ 200 लीटर की दर पर हर चौदह दिन सिंचाई करने से उत्पारदन बढ़ जाता है।

अंतर्रोपण
काजू बागानों में प्रत्येपक क्षेत्र की मृदा, जलवायु व अन्यं स्थाकनीय परिस्थितियों के आधार पर अदरक, हल्दी्, दाल, टैपियोका आदि का अंतर्रोपण किया जा सकता है। पेड़ों के बड़े हो जाने पर काली मिर्च का भी अंतर्रोपण किया जा सकता है।

पौध संरक्षण
काजू बागानों में दिखाई देने वाले कुछ प्रमुख पीड़क हैं चाय मच्छर, तना वेधक, पर्ण सुरंगक, पर्ण मंजरी जालक आदि। इनमें चाय मच्छर व तना वेधक सबसे खतरनाक हैं।
चाय मच्छर : चाय मच्छ‍र बाध से उपज में 30-40% कमी होती है। यह मृदु प्ररोहों, पुष्पोंच तथा अपरिपक्वछ नटों को क्षति पहुँचाता है। वैसे तो इसका आक्रमण हर साल और हर ऋतु में होता है लेकिन सबसे तीक्ष्णि आक्रमण अक्तूsबर से मार्च तक के काल में होता है। इस पीड़क का नियंत्रण तीन फुहारों की फुहार-योजना से किया जा सकता है।

कीटों तथा रोगों से सुरक्षा
1. कीट
यह पाया गया है कि 30 प्रजातियों के कीड़े काजू में लगते हैं। इनमें टी- मॉस्किवटो, फ्लावर थ्रिप, स्टेम एंड रूट बोरर और फ्रूट एंड नट बोरर प्रमुख है जिससे उपज में 30 प्रतिशत की हानि होती है।

टी- मॉस्किवटो:
ये कीड़े (छोटे और बड़े) पेड़ों की कोमल पत्तियाँ, हरी पत्तियों और कच्चे काजू फल को भी चाटते है। इसकी लार विषैली होती है जिससे उस जगह ख़राब हो जाती है जहाँ ये चाटते हैं। अगर बड़ी संख्या में नये पौधों में कीड़े लग जाए तो उनके मरने की खतरा होता है। इन कीड़ों के आक्रमण को दूर से ही पेड़ों की हालत से पहचाना जा सकता है। बरसात के मौसम की शूरूआत में इन कीड़ों की संख्या बहुत बढ़ जाती है।
इस कीट से काजू की रक्षा के लिए कार्बारिल, .1% या फोसालोन .07% या डाइमेथोट .05 प्रतिशत का छिड़काव एक बार नए पत्ते लगने के समय, एक बार पुष्पन के आरभिंक दौर में और एक बार फल लगते समय किया जाना चाहिए।

थ्रिप
ये कीड़े (छोटे-बड़े) पत्तों के भीतरी हिस्से में लगकर उन्हें मुख्य नस के पास खाते है जिसके कारण पत्तों पर पीले दाग पड़ जाते हैं जो बाद में भूरे हो जाते हैं। इसके कारण पत्तों के रंग सफेद होने लगता है। ये कीड़े सूखे मौसम में लगते हैं। मोनोक्रोटोफास .05% या कारबारिल .1% के छिड़काव से इनपर काबू पाया जा सकता है।

स्टेम एंड रूट बोरर
ये छोटे सफेद कीड़े तने और जड़ की छाल के ताजा ऊतकों में छेद कर देते हैं सबएपिडर्मल ऊतकों का आहार कर पेड़ का भीतर इधर-उधर सुरंगे बना देते हैं। वास्कुलर ऊतक के बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाने से रस का प्रवाह रूप जाता है जिससे स्टेम कमजोर हो जाता है। इसके खास लक्षण हैं। कॉलर रीजन में छोटे छोटे छेद, गमोसिस, पत्तों का पीला पड़कर झड़ना और टहनियों का सूख जाना। एक बार ये कीड़े लग जाएँ तो इन्हें पूरी तरह हटाना असंभव हो जाता है। फिर भी भी एक बार अप्रैल-मई में और एक बार नवंबर में 1 प्रतिशत बीएचसी के प्रयोग से इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है।

फल में छेद करनेवाले कीड़े:
ये कीड़े काजू के फल छेद कर देते है जिससे काजू हल्का जो जाता है और उसका आकार ख़राब जो जाता है। इससे बचने के लिए पुष्पण और फलन के समय मोनोक्रोटोफास .05% का छिड़काव करना चाहिए।

रोग
सौभाग्य में काजू में कोई गंभीर बीमारी नहीं लगती। काजू की एक ही समस्या है पाउडरी मिल्ड्यू जो एक फफूंदी के कारण पैदा होती है। यह बीमारी नई टहनियां और फूलों को प्रभावित करती है और वे ख़राब हो जाते हैं। यह रोग खास तौर पर ऐसे मौसम में लगता है जब आसमान में बादल छाए रहते हैं। 2% सल्फर डब्ल्यूपी के छिड़काव से इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है।

काजू की किस्में
काजू के एक पेड़ से 20 से 25 किग्रा तक काजू का उत्पादन संभव है।
राज्य किस्म
आन्ध्र प्रदेश बीपीपी 4, बीपीपी 6, बीपीपी 8
कर्नाटक चिंतामणि 1, चिंतामणि 2, धना (एच-1608), एनआरसीसी सेलेक्शन 2, भास्कर, उल्लाल 1, उल्लाल 3, उल्लाल 4, यूएन 50, वंगूर्ला 4, वेंगूर्ला 7
केरल धना, के 22-1, मडक्कतरा 1, मडक्कतरा 2, कनका, अमृता, प्रियंका
मध्य प्रदेश टी नं. 40, वेंगुर्ला 4
महाराष्ट्र वेंगुर्ला 1, वेंगुर्ला 4, वेंगुर्ला 4, वेंगुर्ला 6, वेंगुर्ला 7
गोवा गोवा 1, गोवा 2, वेंगुर्ला1, वेंगुर्ला 4, वेंगुर्ला 6, वेंगुर्ला 7
ओड़िशा भुनेश्वर 1, बीपीपी और धना
तमिलनाडू वीआरआई 1, वीआरआई  2
प.बंगाल झारग्राम 1, बीपीपी

काजू उत्पादन की मात्रा
फसल की पैदावार कई तत्वों, जैसे कि बीज के प्रकार, पेड़ की उम्र, बागबानी प्रबंध के तौर-तरीके, पौधारोपन के तरीके, मिट्टी के प्रकार और जलवायु की स्थिति पर निर्भर करता है। हालांकि कोई भी एक पेड़ से औसतन 8 से 10 किलो काजू के पैदावार की उम्मीद कर सकता है। हाइब्रिड या संकर और उच्च घनत्व वाले पौधारोपन की स्थिति में और भी ज्यादा पैदावार की संभावना होती है।एक पौधे से 10 किल्लो की फसल होती है तो 1000-1200 रु किल्लो के हिसाब से एक पौधे से एक बार में 12000 रुपये की फसल होगी ।

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महूगणी के खेती
महोगनी के पत्ते औषधी युक्त होती है | महोगनी वृक्ष एक पर्णपाती वृक्ष है और बेलिज (दक्षिण अमेरिका) और डोमिनिकन गणराज्य (कैरिबियन) के राष्ट्रीय वृक्ष है।वैज्ञानिक नाम Swietenia mahogoni  महोगनी लकड़ी एक दृढ़ लकड़ी  है | जिससे चौखटा, फर्नीचर और नाव निर्माण के लिए बेशकीमती है। महोगनी एक औषधीय पौधा है। इसके पत्तों का उपयोग कैंसर, ब्लडप्रेशर, अस्थमा, सर्दी, मधुमेह सहित अन्य रोगों में होता है। यह पौधा 5 वर्ष में एक बार बीज देता है। एक पौधे से 5 किलो बीज मिलते हैं। इसके बीज एक हजार रुपए प्रतिकिलो तक बिकते हैं। वहीं लकड़ी होलसेल में दो हजार से 2200 रुपए प्रति घन फीट बिकती है।

पेड़ के प्रकार
1 वेस्टइंडीज या क्यूबा महोगनी वृक्ष
2 अफ्रीकी महोगनी वृक्ष
3 अमेरिकी महोगनी के पेड़ के रूप में भी जाना जाता केंटकी कॉफी ट्री
4 बड़ा पत्ता महोगनी ट्री - होंडुरास महोगनी वृक्ष
5 ब्राजील महोगनी वृक्ष
6 कैरेबियन महोगनी ट्री, महोगनी वृक्ष के इस प्रकार अत्यंत दुर्लभ है।
7 चाइना महोगनी वृक्ष
8 हवाई महोगनी के पेड़ भी कोआ के रूप में जाना
9 होंडुरास महोगनी ट्री, अक्सर सच है या वास्तविक महोगनी बुलाया
10 भारतीय महोगनी (स्वित्टेनिया महागोन) 30 -40 फीट की ऊंचाई तक बढ़ जाती है
11 मेक्सिसिअन  महोगनी वृक्ष
12 फिलीपीन महोगनी वृक्ष
13 सैंटोस महोगनी वृक्ष
14 स्पेनिश महोगनी वृक्ष

मिट्टी जलवायु
इसे मिट्टी की कई किस्मों में उगाया जा सकता है लेकिन अच्छे निकास वाली गहरी जलोढ़, दोमट और काली मिट्टी महोगनी की खेती के लिए उत्तम रहती है। महोगनी की खेती के लिए मिट्टी की पी एच 6.0-8.0 उपयुक्त होती है। इसकी खेती के लिए गर्म व नम मौसम की आवश्यकता होती है। गर्मी में इसके लिए उचित पानी की व्यवस्था का होनी भी अति आवश्यक है। गनी अमीर, गहरी, अच्छी तरह से सूखा बड़ा पत्ता महोमिट्टी पसंद करती हैं।

ज़मीन की तैयारी
महोगनी की खेती के लिए, अच्छी तरह से तैयार ज़मीन की आवश्यकता होती है। मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए 2-3 बार जोताई करके ज़मीन को समतल करें।

महोगनी पौधे परिपक्व लंबाई
इसकी ऊंचाई लगभग 20 से 40 फिट तक होती है | बड़ा पत्ता महोगनी 150 हो बढ़ता '200'

वृद्धि दर:
यह पेड़ एक धीमी गति से विकास दर से बढ़ता है. महोगनी वृक्ष सूर्य की प्रकाश  में अच्छी तरह से विर्धि करता है।

आकार:
परिपक्व पेड़ मुकुट आकार में अनियमित हो जाते हैं।

पत्तियां और फूल का रंग
इस पेड़ के  पत्ते  20 इंच लंबे होते हैं, तथा फूल छोटे, सुगंधित सफेद या पीले / हरी फूल ढीला समूहों में व्यवस्था होती है |

समय
अप्रैल-जून।

फलों का विवरण
बड़ा पत्ता महोगनी का फल एक बड़ी नाशपाती के आकार कैप्सूल है, फल आमतौर पर मार्च - अप्रैल माह लगते है |  महोगनी फल ग्रे / रंग में भूरे रंग का है और कई के बीज से भरा है।

विवरण
राजसी बड़ा पत्ता महोगनी वृक्ष 200 फुट तक की ऊंचाई तक पहुँचता है और वर्षा वन  में पर्बत और पहाड़ के ऊपर बहुत  देखा जा सकता है। यह 350 साल के लिए रहते हैं, तो यह लोकप्रिय लकड़ी के लिए मनुष्य द्वारा
काटा नहीं जा सकता है।

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हरीतकी  की खेती
हरीतकी (वानस्पतिक नाम:Terminalia chebula)
एक ऊँचा वृक्ष होता है एवं भारत में  निचले हिमालय क्षेत्र में रावी तट से लेकर पूर्व बंगाल-आसाम तक पाँच हजार फीट की ऊँचाई पर पाया जाता है। हिन्दी में इसे 'हरड़' और 'हर्रे' भी कहते हैं। आयुर्वेद ने इसे अमृता, प्राणदा, कायस्था, विजया, मेध्या आदि नामों से जाना जाता है। हरड़ का वृक्ष 60 से 80 फुट तक ऊँचा होता है। इसकी छाल गहरे भूरे रंग की होती है, पत्ते आकार में वासा के पत्र के समान 7 से 20 सेण्टीमीटर लम्बे, डेढ़ इंच चौड़े होते हैं। फूल छोटे, पीताभ श्वेत लंबी मंजरियों में होते हैं। फल एक से तीन इंच तक लंबे और अण्डाकार होते हैं, जिसके पृष्ठ भाग पर पाँच रेखाएँ होती हैं। कच्चे फल हरे तथा पकने पर पीले धूमिल होते हैं। प्रत्येक फल में एक बीज होता है। अप्रैल-मई में नए पल्लव आते हैं। फल शीतकाल में लगते हैं। पके फलों का संग्रह जनवरी से अप्रैल के मध्य किया जाता है।


जलवायु और मिट्टी
हरीतकी की प्रजातियों के प्राकृतिक निवास स्थान हिमालय की तराई है, हरीतकी के लिए तापमान 36 डिग्री सेल्सियस और 45 डिग्री सेल्सियस के बीच होना जरूरी है, और वर्षा 1200 मिमी से प्रतिवर्ष 3000 मिमी के बीच होनी चाहिए । हरीतकी किसी भी प्रकार के मिट्टी उत्पन्न हो जाती है |  लेकिन हरीतकी के अच्छी उपज के लिए  रेतीले दोमट के साथ-साथ मृण्मय दोमट मिट्टी जो मुख्य रूप में ढीला हो और अच्छी तरह से सूखा मिट्टी, पर सबसे अच्छा विकास पा लेता है। यह जंगल में खुले क्षेत्रों में बढ़ता है.

बीज और पौधे
हरीतकी के बीज पौधे से ही प्राप्त कर सकते है | इसका बीज फल के अच्छी तरह पक जाने के बाद यह पूरी तरह से  पीले रंग के हो जाने के बाद बीज जैसे ही वे जमीन गिरने के बाद आप इसको  मई-जून में गर्मियों में एकत्र कर सकते है|

कृषि तकनीक

1 नर्सरी तकनीक
2 रेजिंग प्रजनक


पौधे मौसम की शुरुआत  जून - जुलाई में  बोई जाती है |  बीज को  polybags में बोया जा सकता है। अगर बीज अंकुरण धीमी है, तो बीज pretreating द्वारा सुधार किया जा सकता है। बेड और polybags में मिट्टी कार्बनिक खाद की पर्याप्त अनुपात में डाले  कम से कम 1 : 2 के अनुपात में होना चाहिए। कभी कभी अंकुरित  बीज बेहतर दर प्राप्त करने के लिए बुवाई के लिए उपयोग किया जाता है। आम तौर पर, बड़े आकार के polybags, कम से कम 35 सेमी 22 सेमी ×, उपयोग किया जाता है, इसके बाद से पोधो में जड़ के विकास अपेक्षाकृत तेजी से होता है |  Propagule दर और pretreatment 5 किलो बीज को आप अपने खेत में 1 हेक्टेयर में रोपण कर सकते है|  depulped बीज या तो 15-20 दिनों की अवधि के लिए किण्वन प्रक्रिया द्वारा बिकसित  किया जाना चाहिए, या आप बीज को नर्सरी बेड में बुवाई से पहले उनके व्यापक को काटा जा सकता है औरअगर आप बीज बोना पसंद करते है तो आप बीज को दो दिनों की अवधि के लिए पानी में भिगो कर छोर दे ताकि बीज अच्छी तरह से अंकुरित हो सके । वैकल्पिक रूप से आप बीज को गोबर गारा के साथ मिश्रित और एक से दो सप्ताह के लिए गड्ढे में रखा जा सकते  है।

भूमि तैयार करना और उर्वरक
मिटटी को ठीक तरिके से  झरझरा और भुरभुरा बना ले |  गोल आकार के गढ्ढे खोदे जो  60 सेमी 60 सेमी  60 सेमी की 6 मीटर × 6 मीटर एक कतार में  खोदा जाता है। प्रत्येक गड्ढे की मिट्टी के साथ 15 किलो FYM (farmyard खाद) और (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम) एनपीके का एक मिश्रण  75:30:30 जी मिश्रित कर मिट्टी में पौधे और अंकुर की रोपाई कर सकते  है।

सिंचाई
पौधे की सिचाई महीना में २ बार करनी जरूरी है |  जिसे पौधे हिस्ट पुस्ट  रहते है| पौधे की सिचाई  मिट्टी में मौजूद नमी और मौसम पर निर्भर करता। गर्मी के मौसम में पोधो को हर एक सप्ताह में सिचई करना बहुत जरूरी है नहीं तो पौधे जल सकते है |

रोग और कीट नियंत्रण
पौधों मौसमी कीड़े और कीटों के हमलों जीवित रहने के लिए सक्षम हैं। क्लोरपाइरीफोस 20% चुनाव आयोग के साथ विरोधी दीमक उपचार दीमक की आशंका वाले क्षेत्रों में दी जानी चाहिए।


हरीतकी की सात जातियाँ होती हैं। यह सात जातियाँ इस प्रकार हैं:
1. विजया
2. रोहिणी
3. पूतना
4. अमृता
5. अभया
6. जीवन्ती
7. चेतकी।


हरीतकी पेट की बीमारियों के साथ और भी बहुत से बीमारियों में बेहद लाभ पहुंचाता है| हरड़ खाने के कुछ लाभ इस प्रकार है1

1 हरड़ से बनी गोलियों का सेवन करने से भूख बढ़ती है।
2 हरड़ का चूर्ण खाने से कब्ज से छुटकारा मिलता है।
3 उल्टी होने पर हरड़ और शहद का सेवन करने से उल्टी आना बंद हो जाता है।
4 हरड़ को पीसकर आंखों के आसपास लगाने से आंखों के रोगों से छुटकारा मिलता है।
5 भोजन के बाद अगर पेट में भारीपन महसूस हो तो हरड़ का सेवन करने से राहत मिलती है।
6 हरड़ का सेवन लगातार करने से शरीर में थकावट महसूस नहीं होती और स्फूर्ति बनी रहती है।
7 हरड़ का सेवन गर्भवती स्त्रियों को नहीं करना चाहिए।
8 हरड़ पेट के सभी रोगों से राहत दिलवाने में मददगार साबित हुई है।
9 हरड़ का सेवन करने से खुजली जैसे रोग से भी छुटकारा पाया जा सकता है।
10 अगर शरीर में घाव हो जांए हरड़ से उस घाव को भर देना चाहिए।

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रुद्राक्ष के खेती

रुद्राक्ष के वृक्ष भारत समेत विश्व के अनेक देशों में पाए जाते हैं. यह भारत के पहाड़ी क्षेत्रों तथा मैदानी इलाकों में भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं. रुद्राक्ष का पेड़ किसी अन्य वृक्ष की भांति ही होता है, इसके वृक्ष 50 से लेकर 200 फीट तक पाए जाते हैं तथा इसके पत्ते आकार में लंबे होते हैं. रुद्राक्ष के फूलों का रंग सफेद होता है तथा इस पर लगने वाला फल गोल आकार का होता है जिसके अंदर से गुठली रुप में रुद्राक्ष प्राप्त होता है.
रुद्राक्ष का फल खाने में अधिक स्वादिष्ट नहीं होता इसके फलों का स्वाद कुछ खटा या फिर कसैला सा होता है. इसके हरे फल पकने के पश्चात स्वयं ही गिर जाते हैं और जब उनका आवरण हटता है तो एक उसमे से अमूल्य रुद्राक्ष निकलते हैं. यह इन फलों की गुठली ही होती है. रुद्राक्ष में धारियां सी बनी होती है जो इनके मुखों का निर्धारण करती हैं. रुद्राक्ष को अनेक प्रकार की महीन सफाई प्रक्रिया द्वारा उपयोग में लाने के लिए तैयार किया जाता है जिसे उपयोग में लाकर सभी लाभ उठाते हैं.

भारत के विभिन्न प्रदेशों में रुद्राक्ष
रुद्राक्ष भारत, के हिमालय के प्रदेशों में पाए जाते हैं. इसके अतिरिक्त असम, मध्य प्रदेश, उतरांचल, अरूणांचल प्रदेश, बंगाल, हरिद्वार, गढ़वाल और देहरादून के जंगलों में पर्याप्त मात्र में यह रुद्राक्ष पाए जाते हैं. इसके अलावा दक्षिण भारत में नीलगिरि और मैसूर में तथा कर्नाटक में भी रुद्राक्ष के वृक्ष देखे जा सकते हैं. रामेश्वरम में भी रुद्राक्ष पाया जाता है यहां का रुद्राक्ष काजु की भांति होता है. गंगोत्री और यमुनोत्री के क्षेत्र में भी रुद्राक्ष मिलते हैं.

विश्व के अनेक देशों में रुद्राक्ष
भारत के अतिरिक्त विश्व के अनेक देशों में रुद्राक्ष की खेती की जाती है तथा इसके वृक्ष पाए जाते हैं. नेपाल, जावा, इंडोनेशिया, मलाया जैसे देशों में रुद्राक्ष उत्पन्न होता है. नेपाल ओर इंनेशिया में मिलने वाले रुद्राक्ष भारत में मिलने वाले रुद्राक्षों से अलग होते हैं. नेपाल में बहुत बडे़ आकार का रुद्राक्ष पाया जाता है तथा यहां पर मिलने वाले रुद्राक्ष की किस्में भी बहुत अच्छी मानी गई हैं. नेपाल में एक मुखी रुद्राक्ष बेहतरीन किस्म का होता है.

रुद्राक्ष मूलतः एक जंगली फल है, इसकी पैदावार समुद्र तल से लगभग दो हजार मीटर तक की ऊंचाई वाले पर्वतीय व पठारी क्षेत्रों में होती है। रुद्राक्ष के मूल फल को प्रयोग में लाने के लिए पानी में गलाकर साफ करना पड़ता है। इस आलेख में भारत और विदेशों में पाए जाने वाले रुद्राक्षों की जानकारी दी जा रही है। इसका फल 8-9 मास में सूखकर जब स्वतः पृथ्वी पर गिरता है, तब इसके ऊपर छिलके का आवरण चढ़ा रहता है, जिसे एक विशेष प्रक्रिया द्वारा पानी में गलाकर साफ किया जाता है और इससे मजबूत गुठली के रूप में रुद्राक्ष प्राप्त होता है। रुद्राक्ष के ऊपरी सतह पर प्राकृतिक रूप से संतरे के समान फांकें बनी होती हैं, जिन्हें आध्यात्मिक भाषा में मुख कहा जाता है। कुछ रुद्राक्षों में प्राकृतिक रूप से छिद्र पाए जाते हैं, जो कि उत्तम कहलाते हैं। रुद्राक्षों का मूल्यांकन उनमें पाए जाने वाले छिद्र, मुख, आकार आदि के अनुरूप किया जाता है। रुद्राक्ष की जाति के समान दूसरे फल हैं- भद्राक्ष एवं इंद्राक्ष। भद्राक्ष में रुद्राक्ष के समान मुखजनित धारियां नहीं होतीं और इंद्राक्ष वर्तमान में लुप्तप्राय हो चुका है और कहीं देखने को नहीं मिलता।


जलबायु और मौसम
इसकी पैदावार हेतु उष्ण व सम शीतोष्ण जलवायु एवं 25 से 30 डिग्री सेल्सियस का तापमान अनुकूल माना गया है। इसी कारणवश रुद्राक्ष के वृक्ष समुद्र तल से 2000 मीटर तक की ऊंचाई पर पर्वतीय व पठारी क्षेत्रों तथा नदी या समुद्र के तटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
भारत में रुद्राक्ष मुखयतः हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों, बंगाल, असम, बिहार, मध्यप्रदेश एवं अरुणाचल प्रदेश के जंगलों, सिक्किम, उत्तरांचल में हरिद्वार, गढ़वाल एवं देहरादून के पर्वतीय क्षेत्रों तथा दक्षिण भारत के नीलगिरि, मैसूर और अन्नामलै क्षेत्र में पाए जाते हैं। उत्तरकाशी में गंगोत्री-यमुनोत्री क्षेत्र में भी रुद्राक्ष पाए जाते हैं।

Note 1
कर्नाटक में पाए जाने वाले रुद्राक्ष को मान्यता प्राप्त नहीं है, क्योंकि वानस्पतिक दृष्टिकोण से यहां पाए जाने वाले पेड़ रुद्राक्ष के वृक्ष की जाति से होते हैं। यहां एक मुखी चंद्राकार (जो कि काजू के दाने के आकार का होता है) रुद्राक्ष बड़ी संखया में प्राप्त होते हैं।
 गोलाकार एकमुखी रुद्राक्ष के अप्राप्य होने की वजह से वर्तमान बाजार में चंद्राकार (काजू दाना) एकमुखी रुद्राक्ष का प्रचलन सर्वाधिक है।
नेपाल में सबसे बड़े आकार का रुद्राक्ष पैदा होता है तथा यहां के रुद्राक्ष अच्छी किस्म के होते हैं। नेपाल में रुद्राक्ष हिमालय के पहाड़ों पर पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त नेपाल में रुद्राक्ष के पेड़ धरान, ढीगला आदि स्थानों में भी हैं।
Note 2
संसार में सर्वोत्तम किस्म का एकमुखी बड़े आकार का गोलाकार रुद्राक्ष नेपाल में ही होता है और इसका मूल्य लाखों में होता है। नेपाल का एकमुखी नेपाल में सबसे बड़े आकार का रुद्राक्ष पैदा होता है तथा यहां के रुद्राक्ष अच्छी किस्म के होते हैं। नेपाल में रुद्राक्ष हिमालय के पहाड़ों पर पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त नेपाल में रुद्राक्ष के पेड़ धरान, ढीगला आदि स्थानों में भी हैं। गोलाकार रुद्राक्ष अति दुर्लभ है। संसार में सर्वाधिक (करीब 70 प्रतिशत) रुद्राक्ष के वृक्ष इंडोनेशिया में पाए जाते हैं।
जबकि नेपाल और भारत में लगभग 25 प्रतिशत तथा शेष स्थानों में 5 प्रतिशत होते हैं। संसार में रुद्राक्ष सबसे अधिक भारत में बिकते हैं जिनमें से 60-70 प्रतिशत केवल हरिद्वार में बिकते हैं। भारत और नेपाल में पाए जाने वाले रुद्राक्ष आकार में बड़े होते हैं जबकि मलयेशिया और इंडोनेशिया में पाए जाने वाले रुद्राक्ष मटर के दाने के आकार के होते हैं। इनके वृक्ष बौने, पत्ते हरे तथा फल भूरे होते हैं जो आगे सूखकर भूरे, लाल, काले आदि रंगों में बदल जाते हैं। बिना धारी वाला सबसे बड़े आकार का रुद्राक्ष जावा में पाया गया था।

रुद्राक्ष के फायदे
रुद्राक्ष धारण करने का सबसे बड़ा फायदा यह माना जाता है कि इसे धारण करने का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं है। रुद्राक्ष को पहनने के लिए कोई नियम नहीं है। यह कोई भी व्यक्ति किसी भी स्थिति में धारण कर सकता है।

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चीकू की खेती
चीकू या सपोटा सैपोटेसी कुल का पौधा है,भारत में चीकू अमेरिका के उष्ण कटिबन्धीय भाग से लाया गया था। इसका मूल स्थान मैक्सिको और दक्षिण अमेरिका के अन्य देश हैं। चीकू की खेती मुख्यत: भारत में की जाती है। इसे मुख्यत: लेटेक्स के उत्पादन के लिए प्रयोग किया जाता है, जिसका उपयोग खाने के साथ-साथ जैम, व जैली  चूइंग गम तैयार करने के लिए किया जाता है। परन्तु भारत के गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों में इसकी बड़े क्षेत्रफल में खेती की जाती है।  चीकू की खेती 65 हज़ार एकड़ की भूमि पर की जाती है और इसका वार्षिक उत्पादन 5.4 लाख मीट्रिक टन होता है। इसका फल छोटे आकार का होता है जिसमें 3-5 काले चमकदार बीज होते हैं। चीकू के फलों की त्वचा मोटी व भूरे रंग का होता है। झारखंड, बिहार , उत्तर प्रदेश में चीकू की खेती करने की काफी अच्छी संभावना है। यहाँ अभी चीकू का आयात गुजरात से किया जाता है जो कि ऊँचे दाम पर बिकता है। अत: यदि इसकी खेती झारखंड, बिहार , उत्तर प्रदेश  में शुरू की जाय तो यहाँ के किसानों की अच्छी आमदनी प्राप्त हो सकती है। यहाँ की मिट्टी एवं जलवायु सपोटा के लिए बहुत उपयुक्त है। इस फल को उपजाने के लिये बहुत ज्यादा सिंचाई और अन्य रख-रखाव की जरूरत नहीं है। थोड़ा खाद और बहुत कम पानी इसके पेड़ फलने-फूलने लगते हैं।

मिट्टी जलवायु
इसे मिट्टी की कई किस्मों में उगाया जा सकता है लेकिन अच्छे निकास वाली गहरी जलोढ़, रेतीली  दोमट और काली मिट्टी चीकू की खेती के लिए उत्तम रहती है। चीकू की खेती के लिए मिट्टी की पी एच 6.0-8.0 उपयुक्त होती है। चिकनी मिट्टी और कैल्शियम की उच्च मात्रा युक्त मिट्टी में इसकी खेती ना करें।  इसकी खेती के लिए गर्म व नम मौसम की आवश्यकता होती है। गर्मी में इसके लिए उचित पानी की व्यवस्था का होनी भी आवश्यक है।

ज़मीन की तैयारी
चीकू की खेती के लिए, अच्छी तरह से तैयार ज़मीन की आवश्यकता होती है। मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए 2-3 बार जोताई करके ज़मीन को समतल करें।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार
काली पत्ताी
यह किस्म 2011 में जारी की गई है। यह अधिक उपज वाली और अच्छी गुणवत्ता वाली किस्म है। इसके फल अंडाकार और कम बीज वाले होते हैं  जैसे 1-4 बीज प्रति फल में होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 166 किलो प्रति वृक्ष होती है।

क्रिकेट बाल
 यह किस्म 2011 में जारी की गई है। यह किस्म Calcutta large नाम से प्रसिद्ध है। इसके फल बड़े गोल आकार के, गुद्दा दानेदार होता है । ये फल ज्यादा मीठे नहीं होते। इसकी औसतन पैदावार 157 किलो प्रति वृक्ष होती है।

दूसरे राज्यों की किस्में

छतरी
यह काली पत्ताी किस्म से कम गुणवत्ता वाली किस्म है। यह अधिक उपज वाली किस्म है।

ढोल दीवानी
यह किस्म अच्छी गुणवत्ता वाली उपज देती है। इसके फल अंडाकार होते हैं।
बारामासी: यह किस्म उत्तरी भारत में प्रसिद्ध है। इसके फल गोल और मध्यम होते हैं। यह 12 महीने उपज देने वाली किस्म है।

पॉट सपोटा
पौधे गमले में ही फल देना शुरू कर देते हैं। इसके फल छोटे होते हैं जो कि अंडाकार और शिखर से तीखे होते हैं। फल मीठे और सुगंधित होते हैं।
Calcutta Round, Pala, Vavi Valsa, Pilipatti, Murabba, Baharu, and Gandhevi दूसरे राज्यों में उगाने वाली किस्म है।

बिजाई, बिजाई का समय, फासला, बीज की गहराई

बिजाई मुख्यत: फरवरी से मार्च और अगस्त से अक्तूबर महीने में की जाती है। बिजाई के लिए 9 मी. फासले का प्रयोग करें। 1 मीटर गहरे गड्ढे में बिजाई की जाती है।

खाद
Age of tree (in years) FYM (kg/tree) UREA (gm/tree) SSP (gm/tree) MOP (gm/tree)
1-3 years 25 220-660 300-900 75-250
4-6 years 50 880-1300 1240-1860 340-500
7-9 years 75 1550-2000 2200-2800 600-770
10 years and above 100 2200 3100 850


दिसंबर से जनवरी महीने में, अच्छी तरह से गली हुई रूड़ी की खाद, फासफोरस और पोटाशियम की मात्रा डालें। नाइट्रोजन को दो भागों में बांटकर, पहला भाग मार्च के महीने में और बाकी बची नाइट्रोजन की मात्रा जुलाई से अगस्त महीने में डालें।

सिंचाई
यद्यपि चीकू कुछ सीमा तक सूखे की स्थिति को सहन कर लेता है फिर भी अच्छी उपज के लिए सिंचाई आवश्यक है। छोटे पौधों को 6 से 12 दिन के अन्तर पर सर्दियों से गर्मियों तक सिंचाई करते रहें परन्तु वर्षा के समय अधिक दिनों के अन्तर पर आवश्यकतानुसार ही सिंचाई करें

प्रमुख कीट
चीकू का पंतगा इस पंतगें की पहली जोड़ी के पंखों का रंग काला होता है तथा आधे भाग पर पीले रंग के धब्बे होते हैं। इसकी लटों का रंग गहरा गुलाबी होता है तथा पूरे शरीर पर लम्बी काले रंग की धारियां होती है। यह कीट पत्ताों का गुच्छा बनाकर उसमें रहता है। यह पत्तिायों, कलियों एंव नये पौधों में छेद करके नुक्सान पहुंचाता है।
नियंत्रण
 एण्डोसल्फान 35 ई.सी., 1.5 मिलीलीटर या मोनोकोटोफोस 36 एसएस-1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें । आवश्यकतानुसार यह छिड़काव 15 दिन बाद दोहरायें ।

पर्णजीवी (थ्रिप्स) 
यह कीट बहुत छोटे आकार व काले रंग के होते हैं। यह कोमल तथा नई पत्तिायों का हरा पदार्थ खुरचकर खाते हैं जिससे पत्तिायों पर सफेद धब्बे दिखाई देने लगते हैं। यह पत्तिायां पीली पड़कर सूख जाती है।
नियन्त्रण
पौधों पर फॉस्फोमिडॉन 85 एस एल 0.5 मिलीलीटर या डाईमिथोएड 30 ई.सी. 1.5 मिलीलीटर या मोनोकोटोफोस 36 एस.एस. एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें ।

पत्ते का जाला
इससे पत्तों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। जिससे पत्ते सूख जाते हैं और वृक्ष की टहनियां भी सूख जाती हैं।
नियन्त्रण  नई टहनियां बनने के समय या फलों की तुड़ाई के समय कार्बरील 600 ग्राम या क्लोरपाइरीफॉस 200 मि.ली. या क्विनलफॉस 300 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर 20 दिनों के अंतराल पर स्प्रे करें।

कली की सुंडी
इसकी सुंडियां  वनस्पति कलियों को खाकर उन्हें नष्ट करती हैं।
नियन्त्रण
क्विनलफॉस 300 मि.ली. या फेम 20 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

बालों वाली सुंडी
ये कीट नई टहनियों और पौधे को अपना भोजन बनाकर नष्ट कर देते हैं।
नियन्त्रण
क्विनलफॉस 300 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

प्रमुख व्याधियाँ
इस रोग के प्रकोप से पत्तिायों पर छोटे-छोटे भूरे धब्बे बन जाते हैं। उनकी वजब से उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
नियन्त्रण
 मैन्कोजेब या जाईनेब 2 ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से, का छिड़काव 15 दिव बाद दोहरायें ।

पत्तों पर धब्बा रोग
गहरे जामुनी भूरे रंग के धब्बे जो कि मध्य मे से सफेद रंग के होते हैं देखे जा सकते हैं। फल के तने और पंखुड़ियों पर लंबे धब्बे देखे जा सकते हैं।
नियन्त्रण
कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 400 ग्राम को प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

पुष्पन एवं फलन
वानस्पतिक विधि द्वारा तैयार चीकू के पौधों में दो वर्षो के बाद फूल एवं फल आना आरम्भ हो जाता है। इसमें फल साल में दो बार आता है, पहला फरवरी से जून तक और दूसरा सितम्बर से अक्टूबर तक। फूल लगने से लेकर फल पककर तैयार होने में लगभग चार महीने लग जाते हैं। चीकू में फल गिरने की भी एक गंभीर समस्या है। फल गिरने से रोकने के लिये पुष्पन के समय फूलों पर जिबरेलिक अम्ल के 50 से 100 पी.पी.एम. अथवा फल लगने के तुरन्त बाद प्लैनोफिक्स 4 मिली./ली.पानी के घोल का छिड़काव करने से फलन में वृद्धि एवं फल गिरने में कमी आती है।

उपज:
चीकू का पेड़ तीन चार साल बाद फल देने लग जाता है। जो फल गर्मी में तैयार होते हैं वह अधिक मीठे होते है। विकसित पेड़ से 150 से 200 किलों ग्राम फल प्राप्त हो जाते हैं।

फसल की कटाई
तुड़ाई जुलाई - सितंबर महीने में की जाती है। पर एक बात को ध्यान में रखना चाहिए कि अनपके फलों की तुड़ाई ना करें। तुड़ाई मुख्यत: फलों के हल्के संतरी या आलू रंग के और फलों में कम चिपचिपा दुधिया रंग होने पर की जाती है और इनको वृक्ष से तोड़ना आसान होता है। मुख्यत: 5-10 वर्ष का वृक्ष 250-1000 फल देता है।

कटाई के बाद
तुड़ाई के बाद, छंटाई की जाती है और 7-8 दिनों के लिए 20डिगरी सेल्सियस पर स्टोर किया जाता है। इसकी स्टोरेज क्षमता को 21-25 दिनों तक बढ़ाने के लिए इथाइलिन को निकालकर 5-10 प्रतिशत कार्बनडाईऑक्साइड को डाला जाता है। भंडारण के बाद लकड़ी के बक्सों में पैकिंग की जाती है और लंबी दूरी वाले स्थानों पर भेजा जाता है।

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